माता-पिता से उपेक्षित नवजात को मिला नया जीवन, महिला एवं बाल विकास विभाग के संरक्षण में पहुंचा बच्चा

रायपुर। माता और पिता द्वारा उपेक्षित एक नवजात को सरकार ने नया जीवन दिया है । कालीबाड़ी अस्पताल में पैदा हुए इस नवजात को माता और पिता ने अस्पताल में ही छोड़ दिया था क्योंकि उसे अस्पताल में उपचार की ज़रूरत थी। नवजात को कालीबाड़ी के सरकारी अस्पताल में उपचार के बाद इस दो माह के शिशु को अब महिला एवं बाल विकास ने मातृछाया में संरक्षण दिया है।
अस्पताल के डॉक्टरों और नर्सों की खास देखभाल ने कम वजन वाले इस उपेक्षित बच्चे को अस्पताल के सिक न्यू बोर्न केयर यूनिट (एसएनसीयू ) में विशेष देखभाल से स्वास्थ्य लाभ कराया है। अब यह नवजात स्वस्थ्य और सामान्य वजन का होकर महिला एवं बाल विकास विभाग के संरक्षण में है।
दो माह के इस नवजात के समान ही यूनिट में कम वजन वाले अन्य बच्चों को भी विशेष देखभाल एवं विशेष सुविधा दी जा रही है ताकि बच्चे जल्द से जल्द स्वस्थ्य हो सके और प्रदेश के बालमृत्यु दर में भी कमीं आ सके।
कुष्ठ बस्ती रायपुर निवासी सुखी राम और काम्या ( परिवर्तित नाम) के घर राजा (परिवर्तित नाम ) ने जन्म लिया। बच्चे की मां कुष्ट पीड़ित हैं और पिता मानसिक रोगी । बच्चे का जन्म कालीबाड़ी अस्पताल में हुआ। कम वजन (1.6 किलोग्राम ) होने की वजह से मां को बच्चे की विशेष देखभाल करने की सलाह दी गई । परंतु बच्चे के माता-पिता उसको घर ले जाने की जिद करने लगे। उनकी विशेष काउंसिलिंग की गई और बच्चे को एसएनसीयू में ही रखकर इलाज की सलाह दी गई। परंतु बच्चे के माता-पिता नहीं मानें और बच्चे को अस्पताल में छोड़कर चले गए। नवजात तब से एसएनसीयू में अन्य बच्चों के बच्चों के साथ एसएनसीयू में रहा। जिसे वहां के डॉक्टर एवं नर्स की विशेष देखभाल मिली और उसके वजन में लगातार बढ़ोत्तरी हुई।
जिला कार्यक्रम अधिकारी महिला एवं बाल विकास विभाग अशोक कुमार पांडेय का कहना है जिला प्रशासन के मार्गदर्शन में राजा (परिवर्तित नाम) जैसे अन्य बच्चों का संरक्षण नियमतः विभाग की ओर से किया जाता है। हमें जब भी ऐसे बच्चों की सूचना मिलती है हमारी टीम तत्पर होकर ऐसे बच्चों को आश्रय दिलाती है। कालीबाड़ी अस्पताल के डॉक्टरों और नर्सों की देखभाल से बच्चा मातृछाया में स्वस्थ्य है।
एंटीबायोटिक्स नहीं पोषण पर जोर- एसएनसीयू इंचार्ज डॉ. निलय मोझरकर के मुताबिक अस्पताल में कम वजन वाले नवजात राजा के समान ही कम वजन वाले कई अन्य बच्चों को विशेष देखभाल से ठीक किया जा रहा है। यहां एंटीबायोटिक्स का बहुत ही कम उपयोग किया जाता है। यहां विशेष देखभाल कंगारू केयर, जच्चा-बच्चा देखभाल, मां का दूध पिलाना, छह माह तक सिर्फ मां का दूध पीने की सलाह प्रसूताओं को दी जाती है। नवंबर 2019 से जनवरी 2020 तक एसएनसीयू में कुल 238 भर्ती हुए जिसमें 94 कम वजन वाले बच्चों को नया जीवन मिला। इनमें से 27 बच्चों को ही एंटीबायोटिक्स दिया गया I जबकि 90 बच्चों को विशेष कंगारू मदर केयर संरक्षण मिला और वह स्वस्थ्य हुए।
ऐसे होती है विशेष देखभाल- एसएनसीयू में विशेष नर्सिंग स्टाफ और 24 घंटे शिशुरोग विशेषज्ञ उपलब्ध रहते हैं। 24 घंटे शिशु के स्वास्थ्य पर नजर रखी जाती है। शिशु को कब किस की जरूरत है, यह वे बेहतर जानते हैं। इसीलिए अर्ध विकसित शिशु भी यहां जीवन पाते हैं।
नवजात में रहती हैं समस्याएं – शिशुरोग विशेषज्ञ और एसएनसीयू इंचार्ज डॉ. निलय मोझरकर ने बताया कि बच्चों को बेहतर इलाज के लिए रेडियंट बेबी वार्मर में रखा जाता है। वजन बढ़ाने के लिए 1 से 1.50 किग्रा के शिशु को बेबी वार्मर में लगभग 20 दिन रखा जाता है। किसी भी शिशु का औसत वजन न्यूनतम 2 किग्रा होना चाहिए। समय से पूर्व जन्में बच्चे या कम वजन वाले बच्चों में सांस की तकलीफ, झटके आना, पीलिया सहित अन्य बीमारी आमतौर पर देखी जाती है।
एसएनसीयू का एक दिन का खर्च प्राइवेट अस्पतालों में लगभग 3 हजार- कालीबाड़ी अस्पताल का एसएनसीयू यूनिट वरदान से कम नहीं है। एसएनसीयू यूनिट में अब तक लगभग 5000 बच्चों को भर्ती कर इलाज एवं जटिल केस निपटाए गए हैं। प्राइवेट अस्पतालों में एसएनसीयू सुविधा के लिए एक दिन का खर्च लगभग 2000 से 3000 रूपए आता है जबकि यहां किसी भी दवा या इलाज के लिए इतनी रकम खर्चनी नहीं पड़ती।