सरप्लस धान बनी सरकार के लिए मुसीबत, 2500 में खरीदा अब बेचेंगे 1400 रूपए में


रायपुर, 21 जुलाई। छत्तीसगढ़ सरकार के लिए सरप्लस धान बड़ी मुसीबत बन गया है। छत्तीसगढ़ में समर्थन मूल्य पर खरीदे गए धान को सहेजना सरकार को भारी पड़ रहा है। इसके लिए सरकार ने राजीव गांधी किसान न्याय योजना के न्यूनतम समर्थन मूल्य और इनपुट सहित 2500 रुपये प्रति क्विंटल का भुगतान किया है।
नहीं मिल रहे खरीददार
अब धान को खुले बाजार में बेचने की बात आ रही है तो यह 1350 रुपए से लेकर 1400 रुपए प्रति क्विंटल से अधिक नहीं जा रहा है। पूरा धान लेने के लिए सरकार को खरीदार ही नहीं मिल रहे हैं। फिलहाल नीलामी की प्रक्रिया शुरू की जा रही है। सरकार इससे पहले भी इसी दर से धान को खुले बाजार में नीलाम कर चुकी है।
नई दरें स्वीकृत Support Price
खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री अमरजीत भगत की अध्यक्षता में हुई मंत्रिमंडलीय उपसमिति ने बचे हुए धान की नीलामी के लिए नए दरों का अनुमोदन कर दिया। तय हुआ है कि मोटा या सरना धान 1350 रुपए प्रति क्विंटल और पतला ग्रेड-ए किस्म का धान 1400 रुपया प्रति क्विंटल से अधिक दर पर नीलाम किया जाएगा। मार्कफेड के माध्यम से जो 10 लाख मीट्रिक टन धान नीलाम किया जाना था, उसमें से थोड़ा सा हिस्सा बच गया है। मंत्रिमंडलीय समूह की बैठक में पर्यावरण मंत्री मोहम्मद अकबर, कृषि मंत्री रविंद्र चौबे और सहकारिता मंत्री डॉ. प्रेमसाय सिंह टेकाम शामिल हुए।
20 वर्षों में हुई धान की सर्वाधिक खरीदी
राज्य सरकार ने इस वर्ष 20 लाख से अधिक किसानों से 92 लाख मीट्रिक टन से अधिक धान (Support Price) खरीदा है। पिछले 20 वर्षों के दौरान धान की इतनी खरीदी कभी नहीं हुई थी। यह खरीदी ही सरकार के लिए मुसीबत बनी हुई है। राज्य में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की जरूरत और केंद्रीय पूल में चावल देने के बाद भी सरकार के पास करीब 10 लाख मीट्रिक टन चावल बच रहा है। इसको ही खुले बाजार में बेचने के लिए मुख्यमंत्री ने मंत्रिमंडलीय उपसमिति का गठन किया था।
मार्कफेड ने ली नीलामी की जिम्मेदारी
सरकार ने फरवरी 2021 में इस अतिशेष धान (Support Price) को बेचने का फैसला किया था। इस नीलामी का जिम्मा मार्कफेड ने उठाया। एक अंतर विभागीय समिति भी बनाई गई। मंत्रिमंडलीय उपसमिति ने एक न्यूनतम दर तय किया। कहा गया, इससे कम दर नीलामी नहीं होगी। उसके बाद नीलामी की प्रक्रिया शुरू हुई। बताया जा रहा है, किसानों को भुगतान सहित अन्य खर्च मिलाकर सरकार को एक क्विंटल धान की खरीदी पर करीब 3 हजार रुपए खर्च करने पड़े हैं। खुले बाजार में बिकने से उसका आधा दाम भी नहीं मिल रहा है। सरकार का तर्क है कि धान को खराब होते देखने से अच्छा उसका बिक जाना है।