रायपुर, 20 मई। Jindal’s Support in Crisis : जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती गांवों में हालिया गोलाबारी और आतंकी हमलों से उत्पन्न मानवीय संकट के बीच जिन्दल स्टील ने एक बार फिर सामाजिक जिम्मेदारी की मिसाल पेश की है। कंपनी के चेयरमैन और कुरुक्षेत्र से लोकसभा सांसद नवीन जिन्दल ने संकटग्रस्त नागरिकों के पुनर्वास के लिए सहयोग का ऐलान किया है।
इस पहल के तहत जिन्दल स्टील के 20,000 से अधिक कर्मचारी स्वेच्छा से अपना एक दिन का वेतन दान करेंगे, जिससे जुटाई गई सहायता राशि सीमावर्ती क्षेत्रों में राहत एवं पुनर्वास कार्यों में उपयोग की जाएगी। यह कदम केवल आर्थिक योगदान नहीं, बल्कि देश के लिए एकजुटता और समर्पण की भावना का प्रतीक भी है।
सीमावर्ती नागरिक भी सैनिकों से कम नहीं : नवीन जिन्दल
नवीन जिन्दल ने कहा, “सीमा पर रहने वाले हमारे नागरिक भी सैनिकों की तरह बहादुर हैं। उनका साहस और धैर्य प्रेरणास्पद है। जब वे संकट में हैं, तो उनकी मदद करना हमारा राष्ट्रीय और नैतिक कर्तव्य है। हम सभी देशवासियों से अपील करते हैं कि वे भी इस पुनीत कार्य में भाग लें।”
गौरतलब है कि 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले और उसके बाद पाकिस्तान की ओर से हुई बर्बर गोलाबारी ने कई भारतीय गांवों को प्रभावित किया, जिससे सैकड़ों नागरिक बेघर हो गए। भारत द्वारा जवाबी कार्रवाई में ऑपरेशन सिंदूर की ऐतिहासिक सफलता ने देश को गौरवान्वित किया, लेकिन सीमावर्ती इलाकों में आम नागरिकों को भारी नुकसान झेलना पड़ा।
हर संकट में साथ रहा है जिन्दल स्टील समूह
यह पहला अवसर नहीं है जब जिन्दल स्टील ने राष्ट्रीय आपदा में बढ़-चढ़कर योगदान दिया हो। इससे पहले कोविड-19 महामारी के दौरान कंपनी ने ऑक्सीजन की आपूर्ति, मुफ्त भोजन वितरण और पीएम केयर्स फंड में 25 करोड़ रुपये का योगदान दिया था। 2013 की उत्तराखंड त्रासदी में भी जिन्दल स्टील ने व्यापक राहत कार्य किए थे।
राष्ट्रीय सेवा की मिसाल
जिन्दल स्टील की यह पहल संकट में फंसे सीमावर्ती नागरिकों के लिए संबल और आश्वासन है कि देश उनके साथ खड़ा है। यह एकजुटता पुनर्वास की दिशा में ठोस कदम के साथ-साथ राष्ट्र सेवा की भावना को भी जीवंत करती है। नवीन जिन्दल का यह निर्णय समाज और उद्योग जगत के लिए एक प्रेरणा है कि जब देश संकट में हो, तो हर नागरिक और संस्था को साथ आना चाहिए।
एकजुट भारत की ओर मजबूत कदम
जिन्दल स्टील परिवार (Jindal’s Support in Crisis) की इस सहभागिता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि राष्ट्र निर्माण केवल नीति और सुरक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि संवेदना, सहयोग और सहभागिता से ही एक सशक्त भारत की नींव रखी जा सकती है।


