छत्तीसगढ

विद्यार्थियों की सुगम पढ़ाई के लिए नवाचारी उपायों पर हुई चर्चा, स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा लघु संगोष्ठी का आयोजन

रायपुर। राज्य के दूरस्थ और वनांचल क्षेत्रों में लॉकडाउन की अवधि में स्कूली छात्रों की पढ़ाई को और अधिक सुगम बनाने के लिए राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एस.सी.ई.आर.टी.) द्वारा कई वैकल्पिक नवाचारी प्रोजेक्ट पर काम किया जा रहा है। शिक्षा विभाग द्वारा हाल ही में ऑनलाईन पढ़ाई के लिए ‘पढ़ई तुंहर दुआर‘ नया प्रोजेक्ट किया गया है। वनाचंल क्षेत्रों में कनेक्टविटि में आ रही दिक्कत को ध्यान में रखते हुए (एस.सी.ई.आर.टी.) द्वारा इन दिक्कतों को दूर करने और विद्यार्थियों की पढ़ाई नियमित रूप से बनाए रखने के लिए नए विकल्प तलाशें जा रहे है। आज इन मुद्दों पर विचार-विमर्श के लिए एक दिवसीय लघु संगोष्ठी कार्यशाला का आयोजन किया गया।

स्कूल शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव डॉ. आलोक शुक्ला ने संगोष्ठी में बताया कि कोरोना की वर्तमान परिस्थितियों और राज्य के विभिन्न अंचलों में अध्ययन कर रहे बच्चों को ध्यान में रखते हुए बच्चों की पढ़ाई की वैकल्पिक व्यवस्था हेतु राज्य शासन द्वारा “पढ़ई तुंहर दुआर” कार्यक्रम संचालित किया जा रहा है, जिसमें बड़ी संख्या में शिक्षक एवं विद्यार्थी जुड़ रहे हैं। राज्य में कुछ क्षेत्र नेटवर्क विहीन है और एक बड़ी संख्या में पालकों के पास मोबाइल अथवा स्मार्टफोन नहीं है। ऐसी स्थिति में राज्य स्तर से संचालित ऐसे आईसीटी समर्थित कार्यक्रम सुविधावंचित बच्चों तक पहुंचाने में कठिनाई हो रही है। ऐसी स्थिति में राज्य में समतामूलक शिक्षा सुलभ कराए जाने हेतु ऐसे सुविधावंचित क्षेत्रों में भी शिक्षा की वैकल्पिक व्यवस्थाएं सुनिश्चित किया जाना है। इसे दृष्टिगत रखते हुए इसके लिए कुछ नवाचारी पद्धतियों को खोजकर, विकसित कर उनके क्रियान्वयन के लिए तैयारी करनी होगी।

डॉ. शुक्ला ने कहा कि नए प्रस्तावों को डिजाइन करते समय वर्तमान में उपलब्ध संसाधन, सुरक्षात्मक उपाय, बेहतर आउटपुट एवं मापदंड के भीतर विभिन्न घटकों के चयन को प्राथमिकता देनी होगी। नए प्रस्तावित मॉडल में वर्तमान में कार्यरत शिक्षकों, समुदाय, सेवानिवृत्त शिक्षकों, स्थानीय समुदाय से इच्छुक व्यक्तियों के सहयोग से ऐसी प्रणालियाँ विकसित करनी होगी, जिससे बच्चों को शिक्षा लेने में स्वयं से रूचि विकसित हो। उन्हें बंधे-बंधाए प्रक्रियाओं से दूर रखकर सीखने हेतु पूरी स्वतंत्रता दी जाए और स्थानीय परिस्थितियों एवं आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर उचित शिक्षा की व्यवस्था की जा सके। राज्य में ऐसे मॉडल विकसित करते समय बहुत से पूर्व में संचालित और सफल मॉडल को ध्यान में रख सकते हैं चाहे वह गीजूभाई का सीखने का अवसर हो, मेग्नेट स्कूल, नीलबाग का स्कूल हो, ऋषि वेली का स्कूल, प्रोफेसर खेडा का बैगा बच्चों के लिए संचालित स्कूल, कोंडागांव का इमली महुआ स्कूल, श्री सैनी द्वारा संचालित वनवासी आश्रम स्कूल से लेकर जापान के तोत्तोचान का तोमोए स्कूल आदि ऐसे सफल मॉडलों से सीख लेकर राज्य की परिस्थितियों और आवश्यकताओं एवं भविष्य को ध्यान में रखकर ठोस योजना वार्षिक कार्ययोजना बनाकर क्रियान्वयन किया जाना है।
उल्लेखनीय है कि राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद के संचालक जितेन्द्र कुमार शुक्ला द्वारा शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों के संयोजन में छः विषयो पर समूह चर्चा कराई गई। जिनमें फिजिकल डिस्टेंसिंग को ध्यान में रखते हुए अध्यापन का विकल्प, होम ट्यूशन, चलित विद्यालय, रेडियो पर पाठ का प्रसारण, बच्चों तक सीधे पहुंचने का माध्यम, स्मार्टफोन और नेट की अनुपलब्धता वाले क्षेत्र में वैकल्पिक व्यवस्था, हाईस्कूल-हायर सेकेंडरी स्कूल का संचालन तथा रोजगारमूलक व्यावसायिक प्रशिक्षण की संभावनाओं को खोजना यह विषय दिए गए। इसके अतिरिक्त शिक्षा को घर-घर तक पहुंचाने नवाचारी गतिविधियों हेतु समुदाय से सुझाव आमंत्रित किये गए हैं, जिसे ई-मेल [email protected] पर भेजा जा सकता है।

राज्य स्तरीय संगोष्टी में स्कूल शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारियों के संयोजन में स्कूली शिक्षा में कार्यरत गैर सरकारी संगठन के प्रतिनिधियों को पांच समूहों में विभक्त कर विभिन्न विषयों में समूह चर्चा कर सुझाव आमंत्रित किए गए। सभी समूहों का ऑनलाइन प्रस्तुतिकरण किया गया। इस अवसर पर राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद के अतिरिक्त संचालक श्री आर.एन. सिंह, संयुक्त संचालक डॉ. योगेश शिवहरे, लोक शिक्षण संचालनालय के संयुक्त संचालक श्री के.सी. काबरा, उप संचालक श्री आशुतोष चावरे, तकनीकी निदेशक एन.आई.सी. श्री सोमशेखर, समग्र शिक्षा के डॉ. एम. सुधीश, लोक शिक्षण संचालनालय के उप संचालक श्री अशोक नारायण बंजारा गैर शासकीय संस्थान यूनिसेफ, अजीम प्रेमजी फाउंडेशन, समर्थ चौरिटेबल ट्रस्ट, हुमाना प्यूपिलटू-प्यूपिल इंडिया, टाटा इंस्टिट्यूट ऑफ सोशल साइंस, रूम-टू-रीड, के.पी.एम.जी., द लाइट और अन्य संस्थाओं से प्रतिनिधियों ने परिचर्चा में भाग लिया।

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