Bank Skeleton Case : खौफनाक मजबूरी…! ₹19,300 के लिए भाई ने खोदी बहन की कब्र…कंकाल को कंधे पर लादकर पहुंचा बैंक…सिस्टम पर सवाल…यहां देखें Video Viral

Bank Skeleton Case : खौफनाक मजबूरी…! ₹19,300 के लिए भाई ने खोदी बहन की कब्र…कंकाल को कंधे पर लादकर पहुंचा बैंक…सिस्टम पर सवाल…यहां देखें Video Viral

न्यूज डेस्क, 30 अप्रैल। Bank Skeleton Case : ओडिशा से सामने आई एक घटना ने सिस्टम, गरीबी और संवेदनशीलता, तीनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। आदिवासी युवक जीतू मुंडा अपनी मृत बहन के बैंक खाते से 19,300 रुपये निकालने के लिए जो कदम उठाने को मजबूर हुआ, उसने पूरे देश को झकझोर दिया है।

यह घटना क्योंझर ज़िले के पटना ब्लॉक के मलिपासी इलाके में हुई। स्थानीय ओडिशा ग्राम्य बैंक के बाहर तब अफरा-तफरी मच गई, जब एक आदमी अपनी बहन का कंकाल कंधे पर लादकर बैंक परिसर में पहुंचा। वहां मौजूद लोग मुश्किल से ही यह यकीन कर पा रहे थे कि कोई इंसान, इतनी ज़्यादा बेबसी से मजबूर होकर, ऐसा कदम उठा सकता है।

भाई ने बहन के ₹19,300 निकालने की कोशिश की

जीतू मुंडा दियानाली गांव का रहने वाला है। उसकी बहन, कालरा मुंडा का मलिपासी में ओडिशा ग्राम्य बैंक में एक खाता था, जिसमें ₹19,300 जमा थे। कालरा की मौत दो महीने पहले हो गई थी। उसके पति और इकलौते बच्चे की भी पहले ही मौत हो चुकी थी। नतीजतन, जीतू ही उसका एकमात्र जीवित रिश्तेदार बचा था।

बैंक ने दस्तावेज़ी सबूत मांगे

कुछ दिन पहले, जीतू अपनी बहन के खाते से पैसे निकालने के लिए बैंक गया था। वहां बैंक मैनेजर ने साफ-साफ कह दिया कि उसे या तो खाताधारक को खुद लाना होगा, या फिर मृत्यु प्रमाण पत्र के साथ-साथ कानूनी वारिस होने का सबूत भी देना होगा। जीतू के पास न तो ज़रूरी दस्तावेज़ थे और न ही उसे इन प्रक्रियाओं के बारे में कोई जानकारी थी। कोई और चारा न होने पर, वह खाली हाथ घर लौट आया।

और इस तरह यह सब शुरू हुआ

जीतू एक गरीब आदिवासी आदमी है। उसके लिए, मृत्यु प्रमाण पत्र पाना या कानूनी वारिस प्रमाण पत्र हासिल करना, पहाड़ हटाने जितना ही मुश्किल काम था। उसके पास न तो शिक्षा थी, न पैसा, और न ही उसे इस बात की कोई समझ थी कि प्रशासनिक व्यवस्था कैसे काम करती है। बैंक से कड़ा इनकार मिलने के बाद, वह पूरी तरह से टूट गया।

कंकाल को कब्र से निकालने का फैसला

सोमवार को, जीतू गांव के श्मशान घाट पहुंचा। उसने अपनी बहन की कब्र खोदी और उसके अवशेष बाहर निकाले। कंकाल को एक कपड़े में लपेटकर, उसने उसे अपने कंधे पर उठाया और लगभग तीन किलोमीटर पैदल चलकर बैंक पहुंचा। चिलचिलाती धूप में इस दृश्य को देखने वाला हर व्यक्ति भावुक होकर रो पड़ा।

बैंक के बाहर सन्नाटा छा गया

जब जीतू कंकाल के साथ बैंक के बाहर खड़ा दिखाई दिया, तो देखने वाले दंग रह गए। कुछ लोगों ने अविश्वास में अपना सिर पकड़ लिया, तो कुछ गुस्से से भड़क उठे। मौके पर जमा भीड़ ने बैंक प्रशासन को जमकर लताड़ा। उन्होंने तर्क दिया कि अगर बैंक चाहता, तो वह गांव के सरपंच (मुखिया) के माध्यम से विवरण की पुष्टि कर सकता था, मौके पर जाकर जांच कर सकता था, या बस मानवीय आधार पर ही कोई फैसला ले सकता था।

पुलिस ने मोर्चा संभाला

घटना की खबर मिलते ही, पटना ब्लॉक की पुलिस तुरंत मौके पर पहुंच गई। अधिकारियों ने जीतू को समझाया-बुझाया और उसे शांत करने में कामयाब रहे। उन्होंने उसे भरोसा दिलाया कि इस मामले की जांच मानवीय दृष्टिकोण से की जाएगी और बैंक से भी इस बारे में स्पष्टीकरण मांगा गया है।

बड़ा सवाल: सिस्टम बनाम संवेदनशीलता

यह घटना महज़ एक वायरल वीडियो नहीं है; बल्कि, यह कई गंभीर मुद्दों को उजागर करती है। ग्रामीण क्षेत्रों में दस्तावेज़ प्राप्त करने की जटिल प्रक्रिया, बैंकिंग प्रणाली की कठोरता, और सरकारी सुविधाएं जो आदिवासी तथा निर्धन समुदायों की पहुंच से बाहर बनी हुई हैं।

इस तरह की घटनाएं अक्सर भावनात्मक बहस (Bank Skeleton Case) को जन्म देती हैं। हालांकि यह भी ध्यान रखना जरूरी है, बैंक कर्मचारियों ने नियमों के तहत ही दस्तावेज़ मांगे लेकिन जमीनी स्तर पर लोगों को इन प्रक्रियाओं की जानकारी और मदद नहीं मिलती।

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